मोहन राकेश और हिंदी नाटक

मोहन राकेश आधुनिक काल के सशक्त नाटककार माने जाते हैं | यद्यपि उन्होंने केवल तीन नाटकों की रचना की , तथापि संख्या में कम होने पर उनके नाटक हिंदी में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं | उनके नाटकों के नाम हैं – आषाढ़ का एक दिन (1958), लहरों के राजहंस (1963) तथा आधे-अधूरे (1969) |



इनमें से पहले नाटक में महाकवि कालिदास के प्रेम को नाटक की विषय-वस्तु बनाया गया है, जबकि ‘लहरों के राजहंस’ में नन्द और सुंदरी की कथा महात्मा बुद्ध के परिपेक्ष्य में प्रस्तुत की गयी है | राग-विराग और श्रेय-प्रेय के अंतर्द्वंद्व की सफल अभिव्यक्ति इस नाटक में प्रस्तुत की गयी है | सुंदरी नारी-सौन्दर्य को आकर्षण का चरम बिंदु मानती है और सौन्दर्य के अहं से ग्रस्त है | नन्द अपनी अनिन्ध सुंदरी पत्नी के प्रति आकृष्ट है, किन्तु वह बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर मुंडित मस्तक लिए हुए घर आता है तो उस सौन्दर्यगर्विता सुंदरी का अहं चूर-चूर हो जाता है | इस नाटक में चित्रित नन्द का व्यक्तित्व आधुनिक भावबोध से युक्त संशयशील मानव का प्रतिक है, जो अनिर्णय की स्थिति में रहने के लिए विवश है |

आधे-अधूरे मध्यमवर्गीय जीवन की विडम्बना को प्रस्तुत करने वाला एक सशक्त नाटक है | नायक महेन्द्रनाथ अपने अधूरेपन को भरने के लिए विवाह करता है, परन्तु नायिका ‘सावित्री’ जिस पूर्ण पुरुष की तलाश में है, वह महेन्द्रनाथ में नहीं खोज पाती | वह जिन चार पुरुषों के संपर्क में आती है, सबको अधूरा ही पाती है और अंततः यह सोचने को बाध्य हो जाती है – ‘सबके सब एक से हैं |’

मोहन राकेश के नाटकों का शिल्प बेजोड़ है | रंगमंच की दृष्टि से ये पूर्ण सफल नाटक हैं | संवाद, भाषा, प्रस्तुतीकरण, दृश्य संकेत, रंग निर्देश, छाया-प्रकाश आदि सभी दृष्टियों से वे रंगमंच पर सफलतापूर्वक अभिनीत किये जाने योग्य हैं |




यह भी देखें : यह अंत नहीं : ओम प्रकाश वाल्मीकि

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